राजा अंधा प्रजा है गूंगी
पेट पकड़
बाजार में बिलखे
ठंडे चूल्हे देख देख कर रोये !
छप्पनगजी गपी गणनायक
कोषागार का संचित कोष
विदेश की
परती धरती कौड़ी कौड़ी बोये !
सेवा निवृत वेतन वृति ठिठोली
आधी अधर हंसी भर
पिचके पेट
पांव बल चेपे देह गुलेल सा खींचे,
भरे पेट अनुदानी अन्न हुआ बाजारू
भ्रष्ट व्यवस्था
कचरे खौंदे
जमाखोर जड़ जतन से सींचे,
ठंडी ठंडी अलख अशांत हृदय की
सुने नहीं
बगदरी आकलन
ओढ़ बे कलथी कुम्भकरण सा सोये !
जंतर मंतर की बूढ़ सभा में छलका
दर्द बाढ़ सा
बहा छलक
परनालों में पर कान जुआं न रेंगा,
आंड बांस दरबारी कसरत के अनवरत
प्रयासों का
ढब
हरदम दिखा दूर से आंख घमंडी ठेंगा,
खंडित नीव के नव निर्माणों में
खपी
जवानी जिनकी
उनके कौशल कीरत कब के पोंछे धोये !
गुड़ की ढेली देख चींटियां खड़ी भीत
चढ़ बे उपचार मरी
कुछ
और अभी जीवित हैं बे खाये बीमार,
भात भगौनो पर हैं गली गली के कुत्ते
काबिज
सिंहासन की
सौगातों पर खड़ी किये ऊंची दीवार,
भर उम्मीदेंआंख लबालब स्तुतियों में
बरसों
बरस
अकारथ तन के कुछ बचे खुचे दिन खोये !
भोलानाथ
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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