अर्थाते अच्छा बुरा वक्त कैसे
आते जाते
लम्हों का
गाया वही जो जिया !
सच बांधा शब्दों में ओंठों की
जागी
अलख
सुप्त कानों ने जाया किया !
बहरी गूंगी हलक ओंठ बक्कुर के
शोते धरे
अखरा
अखरा भाषा की नदियां बहाया,
जाली जगलों में जन्मों की
जमी धूल
गर्दिश का
गर्दा फूंक फूंक मुंह से उड़ाया,
भरी भीड़ मेलों में अनगिन
तमाशों के
क्षत्रप तले
भाव पूरित जलाया दिया !
आंखों देखे खुलासों का घाटा
बाढ़ा लिखा
बही खाता
खंगाला क्या खोया पाया,
दुख दर्द के बगरे पर्चों में
छपने के लायक हैं
जैसे
ठाठ ठहरा धुआं मचमचाया,
अद्धी बीड़ी सा खोंसे कनपट
कलम
कट रही
शर्द रातें ओढ़े ओछी कमरिया !
सुलगती रही आग भीतर ही
भीतर
उठता धुआं नभ
बहती व्यारों ने मक्खन सा लीला,
संकरे की बेबस बिलैया सी
कविताई के
ताने
बाने में रोड़ा है धागा गंठीला,
मौसम बदलते युग भ्रांतियों का
उगला
हलाहल
शिव जी के जैसा हमने पिया !
भोलानथ
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