अखरा अढ़ाई अगेती पढाई का
रसिक राग उम्दा
अलापों में आपने
गीत श्रंगार के
वीरानियों में शैल शिखर गाये हैं !
सुन सुन के सिरोमणि शोहरत की
दादें, कानों दिन रात की
निधि वन की
निधियों से उठ उठ
महफ़िल में आपकी दौड़े चले आये हैं !
पुरखों की कही सुनी कानों की गीता
मिला जो सुभीता
कान्हा को जाना
पहचाना राधा को
मीरा की पायल टूटीं जहां,
बहती बहर रुनझुनियों की रुनझुन
गुरियों गढ़ी हथलड़ी की
कड़ी के
चिन्ह वंदन में अंटकी
भटकती है लेखनी हीर सी वहां,
बिहारी की गागर से छलका जो सागर
अंजुरी उलीचा
पी पी के परनाले
बरखा
उलेली बाढ़ बूडों के जैसे उतराये हैं !
प्रेम रसिक भ्रमर भांति कलियों के
बिरझे
अरझे जतवा जतन के
अधिआई रातों की चंदा
दिखी न चुनरिया सी चांदनी लपेटे,
गीतों का सूरज उगा के दिलों में
दिखाओ हमें भी
चकवा की
आंखों में आती
उतरती जोंधइयां सरग सुख समेटे,
उड़ती गोधूलि ढकती तरैयां
लौटें परदेशी
प्राणों की प्राणपरी
गुथ गुथ
गजरे सा प्राणों को प्राण में सजाये हैं !
लोक गीतों के रूप रस राग गुण
गाते गाते
सागर के गहरे
गोते लगाते खपी हैं
कई कई जन्मों की कितनी ही पीढ़ियां,
भावाविभोर हुई राधा की दुनियां
थमे नहीं आंसू
विरह के
उतर गये कदम से कन्हैयां
मुरलिया थमा के तोड़ गये सीढ़ियां,
हमें भी चढ़ाओ मुहब्बत की उंची उंची
श्रेणियां
सेंधुर सिंधौरा की
बचे लाज
खेत गली नुक्क्ड़ व्यभिचार के सताये हैं !
भोलानाथ
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