पाप पुण्य का ख्याल किया न
सपनों में
सच बोला
बोता रहा सदा ही कांटे गुखरू गलियां !
साँझ सकारे माघ नहाते
मंत्र जाप के
संकल्पों में
हौले हौले भुनती रही मछलियां !
जटाजूट माथे का चंदन छलता रहा
बिरानी आँख
जहन छाती की धड़कन
जैसे कालनेमि का मायावी किरदार,
देवी दुर्गा जैसी दादी की थाती के
चोखे चोखे
चंद चिरंगे
परनाना के आंगन खेले खेला चौकीदार,
बांक बर्रइयों के गठबंधन का
भुनुर भुनुर
कोरस मुख कितना
और उड़ाये बैठी फूल तितिलियाँ !
अंधों की बारात चने की फांक
कंठ की
की सूखी खांसी नकुओं के
अवसाद का निथरन उड़े हवाओं में,
लीद हगे की छपी सुर्खियां.
अश्वारोही
अश्वमेघ की आँखों देखी
दफन मरे मन जीवित नब्ज शिराओं में,
ऊंचे बोल की छूंछ कुबोली
गिनते गिनते
उलटी गिनती
गिद्ध तमासा देख उड़ीं गलगलियाँ !
मसले फूल गंध सी क्षमा नहीं
उपवन में फैली
गोबर गंध सड़ांध हवा की
असह जिया अकबकी सांस उकताये,
परपंचों का धुआँ धुआँ पथ सड़क छाप
छुटभैयों के
ज्ञान का सागर
बरसाती नालों सा पुलियों पर छिछलाये ,
भाड़ चना फोड़े न फोड़े चटक चटक
चटका सी
खेत बिराती
फूट रही हैं बिरबाही की फलियां !
भोलानाथ
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