Sunday, 5 February 2023

गुंजन गीत

 गुंजन गीत 

परागी नद में बूड़ बसंत 

सिराने करने लगा फसाद !


बूढी काया हाड पसुरियों 

भर सकेगा 

क्या फिर यौवन का उन्माद ! 


सिकुड़ी देह दांत बिन बिसरी 

स्वाद चटोरी जीभ 

मसोस जिया मन भारी भारी 

मुँह का मुस्का खींच चढ़ाये ,


पुष्प धनुष सर सधे न साधे 

हारे हीचे मन के 

लक्ष्य रूप आकार विविधि 

सन्दर्भ सार के रोचक पाठ पढ़ाये ,


गांठी गाँठ की 

गली गठरियों बोझ 

बुद्धि के प्रस्तावित संवाद ! 


कामकंदला के पग घुंघरू 

लय  की थिरकन दिल 

लहर सांस की साध सके तो 

साध माधवानल जैसा संगीत ,


ठूंठ हुए बरगद का पता पूंछ न 

मिटे महल महके पुरवाई 

धुले कोर न काजल जैसे 

अमर आँख की प्रीत,


जाया समय फिरे न लौटे 

रिसरिस चुये 

छपरिया जैसे छाती का अवसाद ! 


रन बन बोले मूक कोयलिया 

घने पलाशों के वन में 

भौंरों का गायन 

पायल पग बाँध पवन बौराई, 


मेरे आंगन आम बौर की 

मौर बंधी न फिर बसंत क्यों 

औने पौने 

बृद्धाश्रम में पेल रहा ठकुराई, 


इधर उधर के 

कोने कोने बिखरी 

बल्लरियों की गादर गादर याद ! 


भोलानाथ

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