गुंजन गीत
परागी नद में बूड़ बसंत
सिराने करने लगा फसाद !
बूढी काया हाड पसुरियों
भर सकेगा
क्या फिर यौवन का उन्माद !
सिकुड़ी देह दांत बिन बिसरी
स्वाद चटोरी जीभ
मसोस जिया मन भारी भारी
मुँह का मुस्का खींच चढ़ाये ,
पुष्प धनुष सर सधे न साधे
हारे हीचे मन के
लक्ष्य रूप आकार विविधि
सन्दर्भ सार के रोचक पाठ पढ़ाये ,
गांठी गाँठ की
गली गठरियों बोझ
बुद्धि के प्रस्तावित संवाद !
कामकंदला के पग घुंघरू
लय की थिरकन दिल
लहर सांस की साध सके तो
साध माधवानल जैसा संगीत ,
ठूंठ हुए बरगद का पता पूंछ न
मिटे महल महके पुरवाई
धुले कोर न काजल जैसे
अमर आँख की प्रीत,
जाया समय फिरे न लौटे
रिसरिस चुये
छपरिया जैसे छाती का अवसाद !
रन बन बोले मूक कोयलिया
घने पलाशों के वन में
भौंरों का गायन
पायल पग बाँध पवन बौराई,
मेरे आंगन आम बौर की
मौर बंधी न फिर बसंत क्यों
औने पौने
बृद्धाश्रम में पेल रहा ठकुराई,
इधर उधर के
कोने कोने बिखरी
बल्लरियों की गादर गादर याद !
भोलानाथ
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