Friday, 10 February 2017

लगे नहीं झपकी [भोलानाथ के नवगीत ]

लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !
अस्ताचल ढलानों का
बेलगाम सूरज
फिर चाहे
संध्या के जूडे में
बांधना  फुलहरी,
सिन्दूरी घाटियों की
अविरल गोधूली
दिखे नहीं
काबिज सन्नाटे में
सांस की गिलहरी,
एकाकी वनखंडी
परचित पगडण्डी
दुहराये अनुभव की रंग भरी फाग !
लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !
श्रोत चुका पोखर
झुठलाये कैसे
मलबे में दबे दबे
सुकसा सा सूख गईं
भीतरी मछलियाँ,
पपराई माटी पर
घोंघियों के ढेर लगे
बालू से आचमन को
मचल रहीं
कापती अन्जलियाँ,
अलखाये चुप्पियाँ
रंग घोल कुप्पियाँ
चुचुआई शीश पर पारण  के भाग  !
लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !
उजड़ी कस्तूरी की काया
फिर मायामृग की
कल्पित स्निग्धा
वर्णित सुडौल पर
मशाल सा जली,
रंग भेद आयु आक्षेप गौंड
आन मान
पीहर चौबारों की
शकुन छाँव 
साक्ष्य की धुली,
गंध की पुकारी
गुडहल की डारी
छिड़क रही ठूंठ पर फूल का पराग !
लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !

भोलानाथ


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