Wednesday, 25 January 2017

फूहड़ पंगा [भोलानाथ के नवगीत ]



फूहड़ पंगा
खेल है
साझेदारी का !
बेमौत मरा है
निबल
रात उजियारी का !
अलसी सैंढ सी
धसक रही है
धनी कुबेरों  की लंका,
पत्थर बाज शहर के
गाँव मुहल्ले
रह रह पीटें डंका,
बन्दर बाँट
उपज है
ओह्देदारी का !
थकी कतार की पंचाईत
सेत मेत
दरबार में गूंजे,
जैसे चोर चुरा कर
चना खेत का
सडक में होरा भूंजे,
काम धाम हुडदंग
चेहरा
लिये उधारी का !
मालिक मुखिया की
मुस्कान गई
आगे कुआं है पीछे खाई,
झूठ मूठ की भरे कुलाचें
हरही गैया
लाठी देख रम्हाई,
दूबा कहाँ पचाये
पिछली
भागीदारी का !
भोलानाथ

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