Wednesday, 25 January 2017

आंसती अंगूठी [भोलानाथ के नवगीत ]



मूठी से बाहर
रूठी
अंगूठे से तर्जनी
सीधा तनी है !
घी में हैं
मध्यमा अनामिका
गूंगी
कनिष्ठा बनी है !
डूबा दिन ढेरा घुमाते
उँगलियों का
ताल मेल बिगड़ा
गिरी बद्द से सुमेड़ी
अहिर बाबा की कांख से,
अरझी अमारी के
बारीक रेसे
सुरझाते हाथों की लाग बाग़
दिखे नहीं कोई
सिरा साफ आँख से.
उलझन में
आँसती अंगूठी
दुविधा में
मूठी से बाहर
रूठी
अंगूठे से तर्जनी
सीधा तनी है !
घी में हैं
मध्यमा अनामिका
गूंगी
कनिष्ठा बनी है !
ग की कनी है !

भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...