दोनों हाँथ
उठाकर अपने
कह दो
टेढ़ी टोपी वालों
से !
कभी मजमा
और लगा लेना
अभी तो जूझो
रांपी वालों से !
सरहद की
सुन सुनकर खबरें
खौले खून
नसों में ऐसे
जैसे खौले
तेल कड़ाही,
मुहतोड़
जबाबी जुमलों में
बकरों के माफिक
रोज रोज ही
होते
हलाल सिपाही,
स्वर्ग सी
स्वर्णिम घाटी
फतह न होगी
केवल बजते गालों
से !
रोज रोज
अनगिनत हादसे
रुकेंगे कैसे
बैठ सभी को
कुछ रणनीति
बनानी होगी,
अल्लाखोह
पगड़ियों की
देख रही है रैयत
तख़्त के
खातिर
तोंदें हो रहीं
रोगी,
लपट झपट
संसद के भीतर
बंधे हों तीतर
जैसे नालों से !
सरहद पार की
गीदड़ भभकी
गाजर मूली
समझ रही है
अबकी अपने
वीर सपूतों को,
नोट वोट से
ऊपर उठकर
अब तो खोलो
ब्रम्होश के ठीहे
तोड़ो
जज्बाती सूतों को,
अब और नहीं
थमते हैं आंसू
इन
भीगी हुई रुमालों
से !
भोलानाथ
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