शरहद सीमाओं के
जागते पहरियों की
सुने नही उम्मीदें
घुन खाई अंधी राज शाही !
जली भुनी गरम नरम
जो भी मिली पेट धाँध
नींद बाँध
चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ
माहीं !
प्राणों पर आई तो साझा
किया है
दुःख अपना
अर्जियों के दंडभोग
थोपे आरोपों पर फूटती
रुलाई,
रोजमर्रा में सामिल हैं
धमकियाँ
सहज देखे
विस्वास नहीं होता
विपरीत निष्ठा के साजिस
चतुराई,
हंस नहीं बगुलों सी
जांच की कमेटी
पूंछ परख नवटंकी
देगी हल अपनी मनचाही !
बगावत नहीं यह
विरासत में पाई गठरी की
ठाहर पैबंद की गुजारिश
करो ख़ारिज न बाबू सरकारी,
पचड़ों के व्यूहों में बुद्धि
भाव
जज्बों की अनचीन्ही
कैफियत से खेल गये
मठाधीश अपनी पारी,
गोड की गुलामी के
पुस्तैनी ढर्रे
हरगिज मंजूर नहीं हमको
हम हैं कठिन पंथ राही !
हो हल्ला किचिर पिचिर
मीडिया के आगे
हिलक हिलक बिलखे
बूढ़े अम्मा बाबू
कसालों की खुलती जुबान पर,
लीप गया पोत गया
मार गया पालिश फिर जांच
दल
कराहती रही आँख रह रह
बूचडों के झूठे वयान पर,
अभी वैसे ही चिपकी जमात
से
दागदार ओहदेदारी
भरोसा सुलतान का
संसय में अभी वाहवाही !
भोलानाथ
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