Friday, 20 February 2015

पहला पहला प्यार [भोलानाथ के नवगीत ]

मेरा अपने सभी मित्रों को समर्पित "नवगीत"फागुन की फगुनाहट का पहला अहसास निवेदित है !

प्रस्ताओं की
बांहों में
अनछुई
दुपहरी झूली,
मौलश्री यह
सपनों की
पलक
बिरौनी फूली,
एकांतों की
आतिशबाजी
इन्द्रधनुष सा
बिम्बांकित है
भीतर का संसार,
चन्दन लेप
सीमान्त चमेली
पद्मपाँख सा
सहज समर्पण लानी है
पहला पहला प्यार !
उभरी देह
गंध महकाए
रनवन जैसे
तपन नहाई
शहनाई सी
फागुन की पुरवैया,
भरे कपोलों
अरुणाई के
गौर गुलाबी चेहरों पर
वृन्दावन
लिख रहा हो
माखन चोर कन्हैया,
बासंती
भुजबंधों ने
रस कामकेलि
श्रृंगार लिखे,
अर्थाभास
अरुणवर्णी
पुष्प पत्र संदर्भित
सार दिखे,
पोखर का
उड़ गया पपिहरा
हल्दी रंग चढ़ा
चोंच लिये है
तिनकों का उपहार,
मौर बाँध
ऋतुराज की पगड़ी
रंगरंगीली
मनचाहा दिल मोरपांखिया
पहला पहला प्यार !
प्रस्ताओं की
बांहों में
अनछुई
दुपहरी झूली,
मौलश्री यह
सपनों की
पलक
बिरौनी फूली,
एकांतों की
आतिशबाजी
इन्द्रधनुष सा
बिम्बांकित है
भीतर का संसार,
चन्दन लेप
सीमान्त चमेली
पद्मपाँख सा
सहज समर्पण लानी है
पहला पहला प्यार !

भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...