आँख फाड़ के
देख न औघड़
ये सबले हैं जरासंध के धड
!
पुनराभ्यास में
जुटे हुये हैं
दृष्टान्तों सा
जरा के पाले,
बुद्धि के लंगड़े
तर्क असंगति
हलाकान हैं
बाहों भरे उजाले,
रक्तवंस की
नातेदारी जड
बढ़ी दरारों ढीली हुई पकड़ !
आँख फाड़ के
देख न औघड़
ये सबले हैं जरासंध के धड
!
संदेशों के
खेत चरे गदहों ने
खाया पिया
पेट की भूख मिटाई,
लोटा लाटा
खदर बदर सन्नाटा
ठकुर सोहाती
मुह की लौट सुनाई,
मरे पुन्य सब
अर्थभूमि में लड़
स्वयंसिद्धि के पल्टू रहे
अकड !
आँख फाड़ के
देख न औघड़
ये सबले हैं जरासंध के धड
!
वही पुरानी
पृष्ठभूमि की थाली
बजी आज
फिर ठसक में अपने,
नृत्य नाटिका
कठपुतली की
मंचन में
हर ऊँगली देखे सपने,
भौंचक आँख
हमारी नुक्कड़
फाग अमीरी निहारें फक्कड़
आँख फाड़ के
देख न औघड़
ये सबले हैं जरासंध के धड
!
भोलानाथ
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