Friday, 1 May 2020

हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत ]सुनते हो भाई

सुनते हो भाई
बगिया में
बांस की डरैया
फिर फूल आई !
उजड़ी बंसखंडी
अंगडाई ले कर
उठी है
मुह भर जमुहाई ! 
अमुआं के आँगे
बांसों का वन है
पीछे बरस रहे
कूंच भरे महुये , 
पके पके कैथों की
भीनी भीनी खुशबू
नकुआ महकाये
सूंघ रहे कहुये,
ऊँचे बांसों की
फुनगी
बेड़िन के जैसे
नाच रही राई !
सुनते हो भाई
बगिया में
बांस की डरैया
फिर फूल आई !
उजड़ी बंसखंडी
अंगडाई ले कर
उठी है
मुह भर जमुहाई ! 
चौपालों के चुनगुन
भगोरिया पँतरोई
मालिन गिलहरी
मैना सी चहके,
छू छू के
गुड़हल की कलियाँ
अनबोलन ठिठोली
पाँव भौंरों के बहके,
प्राण बसे 
बंसवट की रीझी
लगती तितिलियाँ
गईया लवाई !
सुनते हो भाई
बगिया में
बांस की डरैया
फिर फूल आई !
उजड़ी बंसखंडी
अंगडाई ले कर
उठी है
मुह भर जमुहाई !
भोलानाथ

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