Tuesday, 19 October 2021

अखर गया बिजली का गुल होना

अखर गया 

बिजली का गुल होना
लिथड़े रहे पसीने से
जैसे घाट गुजरिया का
जल कलश मूंड में फूटा !

बहुतेरी कोशिश विफल हुई
जुड़ सके न
सांझ कलम से
भरी अलाप कंठ की
काव्य पाठ का पहला मौका छूटा !

भौहें खिंची कमान हुईं
रौनक मुह की उतरी
पुलक हृदय की हुई नदारद
हतप्रभ रहे देखते
साख सिराने
शहद की शीशी जैसे फूटी,
बेंडहा बैल समय बन आया
औचक घात भाव
वैभव विक्षोभ के कोडों की
असह वेदना से 
कराह कर
करवट करवट नींद रात की टूटी,

नाक कटी पगरैत तमाशा
बाजा वालों की अगुआई
बुझे बुझे बाराती
जैसे
महुआ मोगरी का कूटा !

चूक मामूली बात बड़ी थी
भरा रहा विस्वास लबालब
संभावित विघ्न का कोई
विकल्प न खोजा
साधनहीन चले
कूबत का करतब दिखलाने,
औचक आई आंधी में
उड़ गई छतरियां
भीगा विग लथपथ
चिकनी चांद के गंजेपन में
रह रह उठती खुजली
उंगली करती रही बहाने,

हूँकी हामी किचिर पिचिर
भीतर की समझ न आये
बेचैन हृदय का
उठता बड़ा बबाल
सुकून जहन का लूटा !

गाते अनुभव अपने
थके नहीं
रहे खोलते गांठ रूढ़ियों की
गोरखधंधा सांठगांठ
बतलबरी के
चढ़े नहीं सोपान सीढियां,
पछतावे की युद्धभूमि में
लड़ रहे निहत्थे
आज स्वम् से
अर्जित ज्ञान ग्रंथि का
सूरज अंधियारे में डूबा
राहगीर सी लगी पीढियां,

आज अकेलेपन का
अहसास हुआ
अवकात हमारी
हमको समझ में आई
भ्रामक भ्रम विवेक का टूटा !

भोलानाथ

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