खोज रहा हूँ शहर शहर
अपने बचपन की
स्मृतियों का
वह
सुघर सलोना हिंदुस्तान !
हियोतता
वह जोत की सरगम
दांय गडायन
गांव के बाहर
गोबर लिपे सजे खलिहान !
पगडंडी ढर्रों की गौधूलि
माटी गंध
गौंखरिया बाड़ा
बाहर के दालान बैठका
कंकरीट ने
चील के जैसे डैनों दाबा,
बाजार दुकानों ने
घेरा घर
हांक दिया गौवों की रेवड़
रहीं न आंगन रकर कुलांचें
नकली
दूध की धार मिलावट मावा,
घुंघरू घन्टे
वाले बैलों की
रुनझुन
सींग सिंगौटी
रंगों रंगी कंधौरे शान!
सुबह सुनहरी धूप
साँझ रंगीन छटाएं
हारिल सुआ नीलकंठ की
आवाजाही बिहग बसेरा
कलरव जैसे
हल्दी अवसर के सहगान,
तरह तरह के फसलों वाले
खेतों की हो रही तरक्की
उपज विलक्षण
उत्पाद में बदली
रही न अब जोहड़
कस्बे की पिछली पहचान,
धुआं उगलती
फैक्ट्रियों के
हेम कशीदों में
पकड़ के छाती
खांस रहा है किसान !
देखासिखी अमल से
बढ़ी जरूरत
चरम विलास की आपाधापी
सुध बुध मर्म भूमि का भूली
देशधरम ढर्रों का
नहीं कुछ ख्याल किया,
बढ़े पाँव पर पांव
प्रच्छाली
चादर रही सिकुड़ती
खींचतान अजमाईस
फ़टी छोर का चिथड़ा चिथड़ा
जाता नहीं अब और सिया,
कहाँ मिलेगी
मेड पलाशी
छांव गंध गुड़ घी की
होने लगे
गांव शहरी मेहमान!
भोलानाथ
No comments:
Post a Comment