लोहा लाल पकड़ संसी से
बैठे बैठेभट्ठी में उकड़ू उकताये
गरमा गरम हथौड़ा
मार न पाये
हचर पचर पचरे खांचे के
रही पलटती निहाई !
रोज रोज का गरम नरम
व्यापार समेटा
फेका गोबर घूरे
फोंका फांक फकीरी
भोर उज्जैनी दुपहरी तक्षशिला
संझा
वृंदावन की हृदय समाई !
उड़ा रंग भीतर का भले
फक्क सफेदी
कभी न बाहर आने दी
रंगीन लबादे के भीतर रह
हंसी खुशी
मेहनत कस पौरुष
भस्मी का किरदार जिया,
बेसुरी भैंस के आगे
बजती रही बीन
लय कभी न टूटी
बदली घरु जरूरत के वाजिब
कोरम की संख्या भरपाई के
अनुपालन का
परिचय हर बार दिया,
राग द्वेष की धूप छांव
आवाजाही के
उभरे पदचिन्हों की
भिन्न भिन्न आकृतियों के
अनुकूल आकलन की
सूची में
अंकित है अकूत गहराई !
निजी स्वार्थ सहन के
बाहर जीने का ख्याल किया न
भवबंधन से बंधे रहे
रेफ न कौंधी जहन गिले की
चल रही परिधि के भीतर
लीला जीवन यापन की,
हांक रहे निर्बाह की रेवड़
जस तस
रजत पुलक दिख रही दूर
बारीक बहुत उम्मीदों की
रंगविरंगी
घिसल पट्टियां
साझेदार हैंअपने ज्ञापन की,
अंदाज छोड़ खारिज कर
पुश्तैनी परम्परा के
तुक्ष्य सुभीते
गहिरे गिरे हैं
हीरे मोती माणिक मणियों की
लोक लुभावन
लाजहीन लहजा की खाई !
अफसोस बहुत है
अक्षय विरासत की जड़ से
कट वस्त्र विरत हो
स्विममिंग
पूल में तैर नहाने का
याद आते हैं घाट पाट वे
पावन नाव बिहार नदी के,
खाई खन्दक की दलदल से
मुमकिन रहा न बाहर आना
वैताल विक्रमी हाल
सम्हाल सके न
पाँव रेंगते
गांव शहर की ओर
उजली भोर निहार सदी के,
उंची कोठी उजले बंगले
रंगीन
पूछ अजगर की
पकड़ मरोड़ तिलिस्मी
उलट पुलट तन तोड़े
पढ़े न आंखों कान सुने न
संवेदन की चीख रुलाई !
भोलनाथ
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