आखिर मूस घूस सा
घुस गयायहां भी
जहर जाति का
पंथ समूहों में बंट
कब तक और नकारोगे!
मलयागिरि रहबासी
भील के
बाड़े रोपा चंदन
जहन बिलोय
महकती लकड़ी
अपने चूल्हे बारोगे!
मूंछ मरोड़ का
समय रहा
न शिकार की आजादी
पूंछ हिलाना
भूल गये
हिरनी के शावक
उंची उंची भरें कुलांचें,
एक जमात एक पंथ के
इतिहासों का
न्याय नहीं
कुटिल इरादों के
व्यापक
षड्यंत्रों का
उजला चिट्ठा बांचें,
भीगी बिल्ली
धूप सेंक
चढ़ गई सिकहरे
जंग लगे
हंथियारों से कैसे
मूंछ के बाल उखारोगे !
चढ़े खराद खुरों सा
उपज रहेआक्रोश
परिधि में
शकुनि वाली चाल
द्रोण दक्षिणा
के गुर
कुछ काम नहीं आएंगे,
अधिकार हनन के
घन का दस्ता टूटा
खीला पचरा मार
जोड़ की
झूठ कवायत
सरगर्मी
पचड़े कितना भरमायेंगे,
साहस नहीं यह
अनुचित जिद की
अड़ी में
नाहक कंधे उचकाये
मगजमार की
शिला लिलारों फोरोगे!
कहना मान छोड़
यह सर्पिल पगडंडी
खींच लकीर नई
सीधी सड़क की दौड़
सभी के
साथ दौड़ कर
साबित कर अपनी गति,
चलन के बाहर की
चिल्हर खनकाकर
धन की
डींग डुगडुगी बजा कर
और हांक न
फाड़ बही चुकता कर
पिछली बिकटअति,
उधर रहीं
परतें पालिश की
हिम्मत बटोर
स्वयं साफ कर
यह चिन्दी चिन्दी
पपड़ी कब तक टोरोगे !
भोलानाथ
No comments:
Post a Comment