Monday, 4 October 2021

मेरे मुह में दही जमा है

मेरे मुह में दही जमा है

जब चाहे तब
काट काट के कतरा कतरा
राजा खाये
ले जा तू भी आजा तू भी
लेजा भर भर दोना
काढ़ के माखन घी छांछ बना ले !
आग बहुत है
उंची लपटें दबी कलेजे में
भात पतीला दाल भगौना
अदहन धर
या सेंक रोटियां
फूंक मार बीड़ी सुलगा के
मुह का बीड़ा गांछ बना ले !

लूट मची है गांव इकट्ठा
शहर भौचक्का
मूक बधिर सी सामूहिक सुधबुध
सजग लुटै
घर आंगन गली मोहल्ले
विवस उक्तियाँ
देशधर्म ले डूबा ठाढ़े ठाढ़े,
राजपाट हो गया लुटेरा
राजा लूटे
लूटें करिन्दे
सरेआम बाजार का डाका
पशुवत हांका
प्यासी ओंठ उसेये चेहरे
दिखते तेल के काढ़े काढे,

कभी खत्म न होने वाले
लवण खनिज के
श्रोतों की उद्गम
इस जरजर देह की
अस्थि पंजर पुर्जों को
अपने तृष्णाओं के तरकश
तीर सी भौहें बांछ बना ले !

दर्द कराहों का कितना भी
कुआं जिऊँ मैं
मुह उतरे या देह ढले
जनम जनम से
मेरे अर्थों का पुतला
पलक मुट्ठियां जबड़ा भींचे
मुझमे जीवित रहा सदा,
आईं गईं पीढियां कितनी
बिगुल क्रांति के हाथी हौदे
फूंक पाँव में दबी रही
धूप जेठ कसमसी क्वांर की
पीठ घमोरी
चिलक
चेतना चमकी यदा कदा,

मन की कलप तड़प दिन दूना
अंध आंधियों जैसे
बढ़ती ऊब उबासी
कुंठाओं की गहरी खाई
रह रह उगले
कुबेर खजाना
बसनी बांध लपेटा काँछ बना ले !

कहन कहावत की कथरी का
ओढ़ लबादा
जी रही बेहोशी
फतबों के अल्फाज सुने न
अखबारी ऐलानों की
डुगडुगी के आगे
जख्मों की पीड़ा दर्ज कराये,
जब तक चली चलाई
टूट बिखर कर खूब चलाया
जिया खांड़ सा
उठ बटोर अब
खुद में खुद को सहेज बाँह बल
फेंक हांथ का भारी भरकम
भाला देख जहां तक जाये,

अहसास और न हरदम
ऐसे बौरे रहने की मजबूरी
अब बदल व्यवस्था
पहचान मंत्र
यह प्रजातंत्र का
खर पतवार गुल्म गांछ
दुनियादारी के चांछ बना ले !

भोलानाथ




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