Wednesday, 6 October 2021

कभी जो अर्जित हुआ नहीं

कभी जो 

अर्जित हुआ नहीं
छूट न जाये
बेगाने भय से
बढ़ी रही धुकधुकी हमारी !

खाया पिया
लगा न जी में
जिया उमर भर
सेतमेत की चिंता
बढ़ती रही बिमारी !

हैरत औचक अचरज में
दिन बीते
रात अतीत की उठाधरी
बुद्धि विवेक के
इस कोठे से उस कोठे के
रेक अलियाँ बनी रही,
कहाँ की घाटी
कहाँ के घोड़े
युद्धभूमि का पता नहीं
कनपथियों की रेवड़ में
चेत चुनौती
उंगली उंगली तनी रही,

जारी जतन
जीवनी जीने की
भिन्न सूत्र से
लड़ते लड़ते
आस्तीनों से हारी !
सिंहासन बत्तीसी की
उड़ती रही पुतलियां
प्रश्नों का
बैताल रहा उलझाये
गिनाता युगों युगों से
दाढ़ी मूछ के बाल,
जद्दोजहद बेनामी मुद्दों की
पान गिलौरी जैसे
गलुओं में दबी रही
पीक स्वाद सी
मजे मजे
दिल धरती रही बबाल,

खाली ख्याल पुलावी
खाली खाली
थाली बरतन जैसे
बजते
मती मौन की मारी !

देखा दंगा
सुना लखीमपुर खेरी का
कौंधी जगी चेतना
जैसे सोते से उठ जागा
लीले मेंड़
खेत नहीं लेय डकारे,
बाहुबली राजा का
सेनापती कसाई
कुचले कार
किसान कमेरे करिन्दे
रोने का अधिकार छीन
सच साक्ष्य को गिन गिन मारे,

बेबात ही
जाया किया समय
सपनों से डर कर
असल जिंदगी का
पल पल जिया उधारी !

भोलानाथ

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