लिख लिख
फूलों भेज रहा हूँ
सखे तुम्हें मैं
होली के पैगाम !
सोन सुबह
चन्दन की रोली
चम्पई दुपहरी
अबीरों टीका
और गुलाली
मोर्पंखिया शाम !
कानों मिशरी
घोली तुमने
ओंठों धर के
दुनियाँ भर मिष्ठान,
रंग बिरंगी
हंसी ठिठोली
कैसे भेजूं पैक पन्नियों
मावे के पकवान,
मूवर सभी
आज मौज में
रंग रंगीली होली खेलें
और उछालें
फूहर बातें
सखियों के ले नाम !
भोलानाथ
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...
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