Sunday, 31 March 2013

भोलानाथ के नवगीत [पेट और ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....

पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
शिवालय से लेकर
बीहड़ तक उतरे
सोमरस सुभीतों की
पुश्तैनी मटकी में
भर भर के ताड़ी,
काले कपालों के
भीतर का भेजा
शिकारी रंगों में
कंठों तक डूबा
अँधा अनाडी,
अँडज पखेरुओं के
चूजों की
ऊँची उड़ानें
खोखल में सिमटीं
पूंछों में बांधे
गुलामी का फीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
जगायेगा कब तक
बंजारा सूरज
सांसत में चंदा
चापलूसी के माहिर हैं
झिलमिल सितारे,
साधकों का चिंतन
संजीवनी
जाने न बकरा
सिलौंटियों में घिसे कौन
उठ कर भिनसारे,
गंगा नहाई
बैतरणी की बछिया
मवादों की धारा में
मछली सा डूबी
पगुराती
थूथुन भर लीले सुभीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
तिलक तर्जनी लगाकर
अंगूठे दिखाते
बिदुरों को शकुनी
दूध भरी नदिया
फेक रहे पाशे,
चक्रव्यूह तोड़ते
मच्छर से मरते
अभिमन्युं
परसादी सा बांटते
कौरव अर्जित बताशे,
क्या करेंगे पीटकर
युयुत्सी
सोच के नगाड़े
झूठ मूठ कसमें
मठाधीश खाते
दाबे कखरियों में गीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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