Friday, 16 July 2021

गेंद कहाँ फुटबाल कहाँ

 गेंद कहाँ 

फुटबाल कहाँ मिलती थी हमको

बाग बगीचे खेत हडौरे 

गिल्ली डंडा के खेले हैं ! 

कुश्ती और कबड्डी कन्छे 

खो खो गढ़ा गेंद के 

बचपन और जवानी में 

पापड़ बड़े बड़े  बेले हैं ! 

किरकेट कहानी सी लगती थी 

हाकी सपने

बॉलीवाल के किस्से 

धन्नासेठों के मुह से सुनते थे,

घास काटते गाय चराते 

शाला की कक्षा में बैठे

समय बदलने की तरकीब 

कशीदों सा बुनते थे,

दोयम दर्जों की 

जनगणना के गुणनफलों की 

संख्या बल के शेष रहे हम 

अंतिम अंक अकेले हैं !

गरल सुधा के उभयमुखी 

क्रीड़ा शिक्षक 

तरकारी चोर बना कर हमको 

जब तब ऊंची कूद कुदा देते थे,

टूटे पाँव या सिर फूटे 

फिर पकड़े जाने पर

पिता जहन की आग अंगारे 

गोपद सिंधु बुझा देते थे,

विषम रवायत में क्या करते 

फरियाद दौड़ की 

ऐसे मुंडफोड़ू 

लंपट लंगड़ों के हम चेले हैं !

एकलव्य कबीले का 

छात्र यदि कक्षा में दिख जाता 

अधोगति उपचारों से 

विद्या बलिदान करा लेते थे,

भृष्ठ व्यवस्था के अनुयायी 

छद्मों का परपंच दिखाकर 

आंख का काजल 

चुपचाप चुरा लेते थे,

मजमे भीतर 

नींद बांटते रहे मदारी 

आंख खुली न पुरखे जागे 

नींद के हम ही ढकेले हैं ! 

भोलानाथ


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