Friday, 30 July 2021

उमड़ घुमड़ घन

 उमड़ घुमड़ घन 

लौट पौट 

सरबर पर सरबर

झूम झमाझम बरसे पानी

ताल तलैयाँ भरीं लबालब

नदियां छलकें छोड़ किनारे !

भीगा लथपथ 

नॉट बांधने झुका भदैयाँ 

हल डेंगुर बूढ़े बरदों की 

जोत जतन के 

दिन चढ़ आये 

जैसे व्यवहर के हरकारे ! 


घर भर कोने खूंट दबा 

बोरों के नीचे 

धान का जामन 

छानी छप्पर चुये खाट पर

भीगा दासन भीगी गुदड़ी

भिसकी भीत पछीती,

घर भर शीलन 

नरदा ठेक अगनिया घुटुअन पानी 

तड़क चमक घनघोर 

पिऔधा सहमे चिपके मां की छाती

दोनों हाथ 

उलचते पानी रात चुनौआ की बीती, 


सावन वर्षा 

चुलबुली बाढ़ की 

विपदा सह सह 

कुंदन कदम नहीं थमते हैं 

खेत मचौया 

हियोतता उल्लास ओंठ के गुंन्तारे ! 


धानी धरती 

रिमझिम बरखा

हंसिया खुरपी खेत निराये

बांध बंधुलियाँ पानी पानी

हर तरफ है जस 

पानी में पानी का पहरा,

भींजी देह 

मूंड की खुम्हरी रही तथागत 

मक्की मेड़ों लहरा कर 

सिख रही हो जैसे

बादल बरखा 

पुरवाई का नया ककहरा, 


संझा बिरियाँ गौधुली के 

चिन्ह नहीं हैं 

और न 

बाहर उड़ें चिरैयाँ 

हवा झकोरे बाग बगैचा

बरगद फुनगी मेघ दुलारे ! 


खेत हडौरे 

जोत लाद में व्यस्त कृषक है 

अफरा तफरी मची काम की 

सब दिन की 

मेहनत मजदूरी 

बारिस पहुना सी महमान,

कहीं खेत की 

कांद निदाई 

कहीं रोपाई रोपण करती 

हुलक हृदय सावन की भरती 

ओंठ 

सजाती कजरी के सहगान, 


अमृतमय बोल गीत के 

रह रह घोलें 

कान में मिसरी

पीपर झांझ बजावे 

जस कहे पपीहा 

नील कंठ से फिर से मेघ बुलारे ! 


भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...