ना रे ना रे ना रे बाबा न
लुट पिट आईं
और नहीं
अब लंबी लंबी फेंक !
चूल्हे चक्की मूस बियाने
छानी छप्पर
खपरैलों में
लिया बहुत दिन
अपनी रोटी सेंक !
खाली कुठूलियाँ
खाली बाखर
पीड़ा की अजमाइश को
पेट पीठ में
आग बहुत है
किये धरे पर फेर न पानी,
गील घड़ा सा
ठोंक पीट कर
और असार न
धीरे धीरे
समझदार रैयत आतुर है
लिखने को फिर नई कहानी,
कांटेदार बाड़ की
थर में
थूथुन डारे चर रहे चारा
जैसे
गडायन गोरु गुथे अनेक !
नेक आवाहन पर की
बजती थाली
धरी किनारे
लत्ता चिथरा दीप बंधे हैं
भभक बुझे जो
तेल को ताके,
बंद देश की
खाली सड़कें
गली मुहल्ले खाली
दूर की कौड़ी
हिल्ले रोजी
भात भगौने आगी फाँके,
कंगाली के
सन्नाटों में
आटा दाल
मसालों की पिपियाँ
औंधे धरीं रसोई रेक !
बिगड़ी बीन की धूल झाड़ कर
तार कसे तो
लगा हमें भी
कठिन कसालों के
पल गुजरे
अच्छे दिन फिर आयेंगे,
पता न था कि
राजमहल के
भीतर पलते हाथी
पी कर
दूध की नदियां सारी
धता दांत खाली दिखलायेंगे,
टूटी लयअब
सधें न तुमसे
धरे सिराने साज दिखा न
दीपक राग
बजा कर गाये कजरी टेक !
भोलानाथ
No comments:
Post a Comment