बहती रही अपने धुन में
नदिया समय की
चूना चमक की अहम में
दस्तूरे शहर जीता रहा !
चोला चढ़ा सिंदूर का
महकी छछुंदर
आस्था के केंद्र में
और रसिक जहर पीता रहा!
अदल बदल बांधते रहे पगड़ी
एक दूसरे की सूरत निरख कर
पर्व के सामिल खैराती,
पढ़ता रहा लग्न पत्रिका मुहूरत
और देखता रहा दूल्हा दूर से
धरी मौरी बिराती,
जामा पैजामा मेल नहीं खाता
बरात लगी द्वारे
और पगरैता
लुरकी लहर सीता रहा !
चलती रही आतिशबाजी
फुलझड़ियां छूटती रहीं
रोशन रहा शहर रोशनी के फीचे,
उछलते रहे नामी नाम भीड़ में
चमकते सितारे
नज़र नहीं आये पावों के नीचे,
कुछ तो छटे धूल धुआं
इस वातावरण से
आंखों के वास्ते
पिछला पहर पहर तीता रहा !
उमड़ते घुमड़ते बादलों के नीचे
टूटेगा भ्रम मोर का
नेह नाचने के बाद में,
मिलता नहीं सब कुछ सभी को
रोये या गाये मागे दुआएं
हाथजोड मंशा फरियाद में,
किया छूट जाता है जैसे
ओरिया का पानी
घिनौची घडा
भरा नहीं बिना लहर रीता रहा ! (रसिक=सारस)
भोलानाथ
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