चल
चला चल अकेला !
छोड़
खेमो का ये मेला !
कह न कुछ भी
फेंक लेने दे इन्हें
पांशे धुमा कर,
जय जतन
ढूढ़ें अनाड़ी
पादुकाओं में समाकर,
देखता
चल खेल खेला !
चल
चला चल अकेला !
छोड़
खेमो का ये मेला !
पालने में
पांव कैसे देखते
अंधे जो ठहरे,
और कठुला के सरीखा
कंठ बांधे
गाय सा डहरे,
खेत
खाया खूब केला !
चल
चला चल अकेला !
छोड़
खेमो का ये मेला !
बाग की
महती हिफाजत
बंदर बांट होने लग गई,
फिर भला
कौन रोकेगा इन्हें
लाठियां ले कर नई,
जप
रहा है जाप चेला !
चल
चला चल अकेला !
छोड़
खेमो का ये मेला !
भोलानाथ
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