Friday, 20 August 2021

और कभी के लिए छोड़ दे

 और कभी के लिये छोड़ दे

सिरे जिरह के 

दांत दबाकर और न तान !

फुनगी तना से ठूंठ हुआ बट 

हांक दे रेवड़ 

फिर तन नया वितान ! 


पवन हिलोरी 

छांव रही न रहे पखेरू

पुलक 

गिलहरी सी गायब है,

चर्चों में चीलों के 

गिद्ध बाज हैं

चहक 

चिरैया अजायब है, 


अफरा तफरी में गलगलियाँ

उड़ी कहाँ को

दिखती नहीं रुधान ! 


सूखी थाह टहनियों के

अभिनंदन में 

जो 

थिरक रहे हैं बकुले,

चोंच दबाये 

जीवित मछली 

बांट रहे हों 

जैसे भीड़ को नकुले, 


चुपरी फक्क सफेदी से 

कोढ़ चुये न

धूप गंध सी बची रहे पहचान ! 


हाट बाट बिकने दे 

इनकी चतुराई

छील न छिलके 

प्याज के जैसे,

परत परत की 

छूँछ तमस 

जुही चमेली बेला सी

महकेगी कैसे, 


फोड़ न फुग्गे 

रहने दे इनकी इनमे ही

बह पानी सा छोड़ निशान ! 


भोलनाथ

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