और कभी के लिये छोड़ दे
सिरे जिरह के
दांत दबाकर और न तान !
फुनगी तना से ठूंठ हुआ बट
हांक दे रेवड़
फिर तन नया वितान !
पवन हिलोरी
छांव रही न रहे पखेरू
पुलक
गिलहरी सी गायब है,
चर्चों में चीलों के
गिद्ध बाज हैं
चहक
चिरैया अजायब है,
अफरा तफरी में गलगलियाँ
उड़ी कहाँ को
दिखती नहीं रुधान !
सूखी थाह टहनियों के
अभिनंदन में
जो
थिरक रहे हैं बकुले,
चोंच दबाये
जीवित मछली
बांट रहे हों
जैसे भीड़ को नकुले,
चुपरी फक्क सफेदी से
कोढ़ चुये न
धूप गंध सी बची रहे पहचान !
हाट बाट बिकने दे
इनकी चतुराई
छील न छिलके
प्याज के जैसे,
परत परत की
छूँछ तमस
जुही चमेली बेला सी
महकेगी कैसे,
फोड़ न फुग्गे
रहने दे इनकी इनमे ही
बह पानी सा छोड़ निशान !
भोलनाथ
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