गांव शहर बस्ती का
एक देश है मेरा
और
जुबाने अनेक !
चौकीदारी से पहिले
चौपालों के
कांटे
करकट फेंक !
बेल बबूल की
सूखी टहनी
बाग बगीचे बोये कांटे,
छाती छेद
दंश व्याल सी
फूल फूल को फूल से बांटे,
साफ सफाई के
कूड़े संग
विषदन्ति को
दे आगी में सेंक !
शरहद के उस पार के
लठ जादूगर को
इस पार के पंडे,
कुछ गुपचुप
कुछ ठोक के छाती
भेज रहे मंत्रों के गंडे,
देव भगाकर
भूत
पूजने वालों के
नहीं इरादे नेक !
बिराध विहीन बना
माटी को फूल ही फूल
यहां खिलने दे,
विविध वितानों के
पानी को
एक ही पानी में मिलने दे,
विश्व पटल पर
नग सा दमके
मेरे देश का
पानी और विवेक !,
भोलानाथ
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