दो धड़े में बहती धारा के
साझा उद्गम और किनारा के
लहरों के फहराते आंचल पर
सूर्यमुखी पैगाम लिखो !
बनती बिगड़ती सीमाओं के
जलती सुलगती समिधाओं के
हवन कुंड की आग आहूति
बेहिचक धुओं के नाम लिखो !
आग धधक अंगार में
जल कर उठा जो ऊपर
हवा झकोरों के
बेरहम थपेड़े
खा खा कर के टूटा बिखरा,
माटी बंदन के सहभाग का
अवसर मिला नहीं
पाला पतझर
शूल बिछौना
पचा पेट में मुह का अखरा,
चरखे की निश्चित हदबंदी के
जय हिंद घोष पल पाबंदी के
सच का साथ मिला न जिसको
गाथा उनकी चारो धाम लिखो !
तन्हाई में झुके नहीं
रुके रहे आंखों में आंसू
झरे नहीं
रहे खेलते
ओठों से गीत सदा,
लहराता रहा समुंदर
भीतर भीतर उठते रहे
ज्वार आजादी के
और गुलामी
रही भांजती पीठ गदा,
असआत्मजयी बलिदानों के
उन उजड़े ठौर ठिकानों के
जिनके सिर पर छांव नहीं है
उनको आठों याम लिखो !
मदहोशी की गहरी नींद से
हमको झकझोर जगाया
ले चलने को
उंजियारों की ओर
साथ में अपने,
अर्थ दिया
जीवन जीने का
परिचय खुद से खुद का
करवाकर काजल सा आँजा
आंखों में सुरमैया सपने,
नूतन शिल्प गढ़े आकारों के
फाके रहे दिन गये बहारों के
माटी पर मर मिटने वालों को
हिंदुस्तान का राम लिखो !
भोलानाथ
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