Monday, 23 August 2021

दूर देश खलबली मची है

दूर देश 

खलबली मची है 

अल्लाख्वाह 

हमारे घर में !

चीखें चील 

बाज चिल्लायें

बांध 

घोसले सुआ के पर में ! 


कौआ कला के 

सहज धर्म को

चाल कबूतर की

फूटी आंख नहीं भाती,

बैठ गोद में बरगद की

उड़ती 

दूध चिरैया को 

खोंपा मोगरी धमकाती, 


कुछ भी 

कहने की आजादी

कितना 

और जियेगी मगहर में !


ढंडक पैल 

जत्थेदारी की

पूंछ परख है न बमुरे पर

न महुये की डार,

राजधर्म 

बतकही न जाने

बुद्धि के पैदल ठरके

झरे ओंठ से रार, 


फांस विषैली 

रह रह चुभती

धंसी हुई 

जो जहन की थर में! 


पेटपाल सुविधाओं के

लगे ढेर 

नहीं दिखते

न तोल मोल के झोल,

पले बढ़े 

जिस माटी में

प्रतिबद्ध कैफियत 

बोल रही है बोल कुबोल,


संविधान के 

नये मसौदे

फंसे हैं 

संसद की अटहर में ! 


भोलानाथ

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