पीड़ित करे
या पत्रकार सच पूछे
समय पटल के
प्रश्नों के उत्तर तो देने होंगे
वर्तमान दे
या फिर दे इतिहास !
धरती अम्बर
और जलाशय नदियों सागर
सुरसा जैसे योजन भर
मुख द्वार मिलेंगे
लील उगलते
उभय पक्ष उपहास !
धरे रहेंगे शोधग्रंथ
इस
बुद्धिभाव परिभाषा के
ज्वाला मुखियों के
मौन मुहाने पर,
पूंछ परख की
कोई समितियां
गठित न होंगी
कोई चर्चा बहस न होगी
फिर किसी बहाने पर,
पीढ़ी दर पीढ़ी
देंगे सूरज चांद गवाही
साक्ष्य में होगा
धुंध से लिपटा
धूमिल धूमिल लिथड़ा
रंग विहीन अकाश !
धोये दूध से
लिखित आचरण
व्यव्हार से बाहर
अभय मांगते गुणी
संत जन मिल जाते हैं,
अलख जगाते
गाते गीत गवैयों के
कंठ जीभ के
अखरे अखरे
ओठों से सिल जाते हैं,
प्रश्न पत्र लिखते लिखते
वाजिब उत्तर ताजा
खबरों में छप जाते है
कठिन परीक्षा
कफ़न में लिपटी
आड़ी तिरछी लाश !
गती शील सच झूठ के
अपने
अलग अलग रथ
अलग अलग पहिये हैं
मंजिल एक पंथ बहुतेरे,
दुबकी विनय
टूट कर भीतर
चीखे तमस तरेरे आंखें
मन
माफिक जुगत सिरायें फेरे,
बड़ी पगड़ियों के
बड़े पैंतरे
मुह की शाह जबाबी हाजिर
पुल बिन पानी पर चलने का
लिखें
रोज नव नूतन अहसास !
भोलानाथ
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