मन से कटे नहीं खुद
गये कटाये
धरी सिराने
सगी हुई न म्यान कटारी !
हम तो
गढ़ने के माहिर थे
पहचान सके न
तात निहाई के व्यापारी !
होश बेहोश नहीं
कुछ थके थके हैं
बेमतलब की भाग दौड़ से
अभी अभी लौटे हैं,
अपना यहां नहीं है कोई
दूध भात गुड़
मुह का छूटा
गलबहियों के बिके मुखौटे हैं,
कंठ कटाकर
तंद्रा टूटी
हक्का बक्का
रहे देखते हवा हुई यारी !
पगड़ी रही आश अस टूटी
जस फूटी परखनली का
बेपरखा दृव
बून्द बून्द बह बगरा,
जांच परख से बाहर
अब कुछ शेष नहीँ
उल्टी ऊंट बिठाई की करवट का
सच जी भर अखरा,
बजन उठाते
बाल झड़े सब सिर के
निष्पाप हृदय
छल लिख रहा लाचारी !
कोरे कागज सा मन था अपना
खींच खींच
ज्योतिष चौघड़िया
शनि राहु की गणना क्या करते,
आने वाले कल के प्रति
निश्चिंत रहे हम
कर्मभूमि पदचिन्ह देख
चल पड़े उसी पर पग धरते,
निष्ठा का निष्कर्ष
जिया हमने भी
रेशम
डोर की खेपें खूब उतारी !
भोलानाथ
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