Monday, 30 August 2021

कभी तुमने सुना क्या

कभी तुमने 

सुना क्या 

हमने गीत गाये हैं 

दिल से तुम्हारे श्रृंगार के ! 


सहज धर्म 

चंदा के चौरे से 

खाली लौट आये

तने ताज गुम्बद निहार के ! 


दिल जला 

सुलगे इकलौते 

अगरबत्तियों के जैसे

धुआं धुआं रातें,

तड़पे हैं मछली तड़प 

और 

गांव छोड़ आये 

हीर की अंतरंग बातें,


लिखआये 

काल के कपाल पर

जन्मेंगे युग युग 

प्रतीक्षा में प्यार के! 


तुम्हारी छुअन सांसें

चंदन की खुशबू सा 

महमह

नकुओं में महके,

अधूरी रही जो कहानी 

कई कई 

जन्मों कहेंगे 

एक दूजे में रह के,


जीवन की मेज पर 

धरे जो

मुरझाये गजरे 

महके थे जूड़े उधार के !


शिकवे नहीं तुमसे हमें 

छुपे रहे 

अपने अनिश्चय की 

ओढ़ कर गदोली,

देखते रहे 

भव बंधन से बंधे बंधे

रोती बिलखती

घर उठती डोली ,


द्वार पट 

हटाया न घूंघट उठाया

कहा नहीं कुछ भी

तुमको पुकार के ! 


भोलानाथ

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