Saturday, 4 September 2021

पानी पाथर हिचक नहीं

 पानी 

पाथर हिचक नहीं 

भीतर मन की 

एक बार लिख देख ! 


हुनर कलम की 

मन से है 

पंडित हो या 

हो कोई सिख शेख ! 


आग भरी माचिस की 

डिबिया जैसे 

केवल बीड़ी चुंगी 

मत सुलगा 

यह कलम है भैया 

आग ही आग उगलने दे,

बरसा पोखर 

ताल तलैया की सोहरत में  

पाल इसे न 

कुचली दबी दलित 

मर्यादा के लिये 

शिशु सा खूब मचलने दे, 


आगी पानी 

खेल के 

खेला की 

दीवार में तू दिख मेख! 


तोड़ सन्नाटा धरती अम्बर 

श्रजन साधिका 

विनय विनाश की 

देवी दुर्गा जैसी 

वाजिब 

अभव्यक्ति आजादी साध,

स्याही नहीं 

भरी है इसमें ज्ञान की 

रौनक 

इसके विज्ञान गणित की 

गणना और रसायन का 

साफा सिर बांध, 


दिया 

जला देवालय में 

देख न गुम्बद की 

काली कालिख रेख ! 


परिचय और अपरिचय के 

असमंजस की 

फांस विषैली 

बुद्धि अबुद्धि के 

गहरे बीच फंसी जो

उसे निकाल जहन से,

निजता के भाव बोध 

कितने भी छूटें पीछे 

छोभ न कर 

कार्य क्षेत्र के 

कर्म बिंदु से छूटे न 

कुछ अहम कहन से, 


चाहे भले 

पढ़े न गाये 

दुनिया जिये 

तुम्हारे आलिख़ लेख ! 


भोलानाथ

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