हार गए हैं
साथी सफर के रपक झुके हैंफुर्सत किसे जो
गांठी खोले तौले थथोले
देखे पीठाहीं केर गठरिया !
आत्मजयी हुंकार ठसक में
सुने न कुनवा
थके पाँव मन मार सांस को
खांस खांस के सहज बनाते
चढ़ रहे पठरिया !
भवबंधन का बोझ उठाये
पीड़ा अपनी हलक दबाये
बटोर ऊर्जा अस्थिपंजर
आपा हिम्मत न खोने की
यह चल रही कवायद,
कदम कदम के सदमों को
सहज बनाने की
इस कठिन राह में
सुगम युक्ति की कोई किरण पहेली
बुध्दि में कौंधे सायद,
चुनचुन मोती वैभव सारा
ले उड़ भागे रिश्तों के सब सारस
छोड़ हृदय में
केचही के नन्हें शावक
गिन नाखून अठरिया !
आगे पीछे हरिबोल भजन के
सहगान सहारे
खटक विक्षोभ भाव के
खालीपन पर जीवन का
लय राग मरहम सा घाव लगाते,
समय संरचना के मलबे को
झाड़ बटोर फूक आग में
राख बहा देने के
साहस संवेदन के
ताजा टटका बोध जगाते,
व्यामोहों का कूड़ा करकट
कुशल कृषक के जैसे
परसाना होगा
ख्यालों की सैंढ़ी से
कुशियारी की गांठ ठठरिया !
अहसास मार अनुभूति का जीना
सुख सदमों के
बीच नून सा पिसते
शिल बट्टा को पल पल चुभते
रहे स्वाद पर्याय सदा,
पाय विरासत पुरखों की
किया न साझा समय से
लीक न बदली
हिचकोलों के उछले शावक
कुछ इधर गिरे कुछ उधर किनाई किदा,
लैया लड्डू गुड़ शक्कर
दूध सिमैयाँ कलेबा महेरी पुसाई न
पी पी पीना
रहे चबाते मुह भर
भुजिया नमकीन मठरियां !
भोलानाथ
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