भीतर मन की खूंटी से
जो भी चित्र टंगे थेझाड़ा पोंछा धूल हटाई
अगल बगल
दीवार मुक्त की जालों से !
नियम बद्ध अर्चन के
खातिर झुके चरण में
छुआ फ्रेम तो झरे रेत सा
मूड के ऊपर
चिपक चिपक रूमालों से!
शुभ चिंतक
मुखड़े नही सभी चेहरे थे
खुली कलई तो
झरा अतीत
सामने सच आया,
झनझना गई देह
रह गया भौचक्का
दिल दिमाग
देख आस्था के
भीतर भूत का साया,
क्या उत्तर दूं घिरा हूं
प्यासा पात्र लिये खाली
खुद के अपने
एकाकी करुण
हृदय के पूछे यक्ष सवालों से !
खेले गए परस पर
खेल जो गुपचुप
हार जीत या
वर्चश्व के लिए नहीं थे
फिर क्या थे ?
वक्ष विराजी
श्रद्धा के
पीठ सवारी करने वाले
विक्रम वैताल नहीं
तो क्या थे?
अपने कभी समझ
न आने वाली गणित के
सूत्रों को तोतों जैसे
क्या रटना
होते रहे फेल हम सालों से !
बुझे अलाव की
आंच
ऊर्जा से लथपथ
भ्रम की भस्मी पुड़िया
बांट भीड़ को सारी,
निकल गया
दबे पांव
चुपचाप जोगिया
भक्ति भजन अर्चन
दर्शन की छोड़ अधारी,
छोर सिरे सब छोड़
उड़ा दी हवा उम्मीदें
पकड़ी बांह तसल्ली
टूटा सौदा
दूर हुये बेवफ़ा दलालों से !
भोलानाथ
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