घर बैठे बेकार
लाचारी नेकैसे कैसे
हथकंडे अपनाये !
रंग उड़े
सारी पगड़ी के
कोशिश हुई नाकाम
बचे न सूप ओढाये!
औने पौने बिकी
मिलकियत पुस्तैनी सब
छीन झपट कर अपनों ने ही
खींच के पीढ़ा
थाल की रोटी खाई,
पी कर पूरी दाल
कटोरी उलट दी थाली
हंडिया फोरी
बेदखल किया घर चल गई
घर में घर की ठकुराई,
आग अंगारे
हम उगल सके न
छानी छप्पर
हाथ के अपने बनाये !
नहीं उछाली हमने
उनकी पगड़ी
जिसको हाथों से अपने
उनके शीश आशीष
दुआओं जैसे सजाई,
अपने पराये का भेद
किया न सोच समझ कर
अपना उनका हित
कमी सभी कुछ पूरी की
मांग नहीं ठुकराई,
पहचान न पाये
फिरते
रहे उमर भर
सांप संपोले मूड उठाये !
भरा रहा विश्वास लबालब
जुते रहे दिन रात
कभी खुद का
ख्याल किया न
आगे दिखा कुआं
न पीछे की खाई,
लील गई
रानी के नवलखा हार सी
अपने दीवार की
नन्ही सी खूंटी चली न
आगे समय के हाथापाई,
दिशाहीन आ बैठे
सड़क किनारे
सायद कोई
साथ को हाथ बढ़ाये !
भोलानाथ
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