Wednesday, 8 September 2021

सामा पसही कोदों कुटकी

सामा पसही कोदों कुटुकी

धनकुट 

ज्वार मकाई के सेये हैं

जिया जरूरत 

भोगा बचपन लंबी लंबी पातें ! 


भूलें नहीं भुलाये 

कोटे के वह सही अंगूठे 

अन्न विदेसी

पुआल बिछौना खटियों 

अगहन पूस की रातें ! 


नंगी देह के चढ़े चीथड़े 

चलती फिरती 

अलगनी थे जैसे 

फ़टी चड्डियाँ 

ठंड हथेली मुडी कुहनियां 

कांखे अंग छुपाते,

बेरहम समय की 

सर्द हवाओं के 

समझौतों से संघर्ष किया 

कथा कहानी खूब सुने 

माई के 

साहस खूब बटोरा बतियाते, 


ओछी चादर ओढ़ के सोये 

ढांके पाँव तो 

मुह खुल जाये 

हन्नागुन्ना करवट से 

सौ सौ गुजरें रोज बारातें ! 


जस तस कटती रात 

भोर फिर सुबह की 

धूप सेंक कर खिल उठते 

चेहरे मुरझाये 

किन्तु कठिन कसालों के 

दिन लगते पेट को भारी,

लट पट धांधर धंधे तो 

खेल की सूझे 

बूझे कोई न करे चर्चना 

सुधियों में रहे न 

भात भगौना 

और पतीली की तरकारी, 


कायल हैं वन उपज के 

जिसने आड़े समय में 

दिया सहारा रही साथ 

में हरदम 

जैसे टटिया टाट कनातें ! 


स्कूलों का बुरा हाल था 

अवसर देख समय ने 

अच्छा धुना रुई के जैसे 

रुआ रुआ 

आवेषित हुआ बुद्धि का 

बगरी छोड़ बसेरा,

अपनी स्वांस खलैतों से 

स्वयंप्रभा की भट्ठी में 

लौह गलाया 

ठोंक ठठा कर 

देता रहा 

अनेकानेक आकार ठठेरा, 


धीरे धीरे बदला समय 

अभी तो बह निकला 

कई धाराओं में 

इसीलिये अंधे भादो के 

सावन सुतरी कातें ! 


भोलानाथ

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