जी जांगर चोरी कर
कथरी ओढे
घी दूध कहाँ से खाते
हाथ गोड़ की
कायल मूछें हो गईं टेढ़ी !
रही रमहाती
भूखी प्यासी गैया
ध्यान दिया न चारा डारा
बंधी रही
निरीह सी अमरा की पेढ़ी !
अटे पड़े अंदर से बाहर
घर के
स्वारह अटहर में
कंधों तक डूबी
रही अढाती
गुड़िया की अम्मा
हम डारे रहे रुई कान में,
बीड़ी
फूंकी खैनी खाई
थूका चारो ओर
गंद मचाया
टाले टल्ले बैठे ठाले
किया नहीं कुछ
आलस हावी रही जान में,
जागा नहीं विवेक
झुर झुर चलती रही पुरवैया
झर झर थोड़ी थार
फुर फुर
उड़ती रही भुस्स की सेढी !
मुह में गाली
जहन में गुस्सा
आते जाते कब तक सहती
दो दो गुच्चा
पेट पाँव के द्वन्द भला
रोज रोज
ऎसे कब तक रहती,
बाहर गई गाय
फिर कभी
न वापस लौटी
होते रहे थकन से चूर
बैठक में बैठे बैठे
किये जतन होते
तो नदिया दूध की बहती,
अंड़ा अड़ी की
ठकुर मिजाजी में
लांक जला जल गई
दांय गडाइन भागे बैल
तोड़ कर ठिकधर मेढ़ी !
अभद्र आचरण की
पृष्ठभूमि का अपकर्म
छोड़ पहचान लिया होता
खुशहाल जिंदगी के
मंत्र तंत्र तो
हम भी
खाते तालमखाने,
हाथ मीज
पिडरी सहलाते कैसे
अच्छे दिन आते
फुर्र फुर्र उड़ गई चिरैया
खेत खाय के
तब भीतर का
जागा जोगी राय बखाने,
ऊंची नाक के ऊंचे गिरगिट
पहचान समय को
खरभर खरभर सरपट
भागे
पास के पतझर बाड़ की रेढी !
भोलानाथ
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