मरा अनार खबर सुन सायद
बिरह व्यथा से
सूखी बेल रसाला
बाढ़े बरिहाअमुआ अमरा डार
रुके न
फ़ैला फुनगी जबरा पेल !
दबा सकोच में सहमी
जैसे
रस्सी सधी डरैयां
थरथर भय बस कापे
आंख सहायक दिखे न कोई
रह रह सावन सींचे बेल !
काली काली रुआ रुआ सी
धरती धंसती
बादल की आगोश का सूरज
ओढ़ रजाई
अंग अंग लिख रहा
जतन से भेंट भलाई लेख,
हवा बाबरी हवा बनाते
नद नदिया ताल तलैया
पोखर झरने
पीपर बरगद को समझाती
खींच रही
मन मतलब वाली रेख,
लाटा फांदा तिकड़म के
चहकारे
महुआ अर्क की सूंघ शीशियां
चूहे बिल्ली छोड़ अदावट
अंतरा क्वातरा पंसारी बन बैठे
क्या जाने हल्दी गांठ के खेल !
जत्त कत्त कुआंर मास की
उत्तम बरखा
तपती धरती रह रह
मरती हरियाली की
प्यास बुझा कर
सदा सदा अमरत्व जी जाती ,
लक्ष्मण रेखा के पीछे का
खालीपन
उल्टे पांव न लांघ
पदचिन्हों में पढ़
अतीत के किस्से
धीरज दुर्दिन धूप पी जाती ,
फुरसत नहीं समय को
कभी नहीं पूछेगा
रुक कर तुमसे गौ सेवा
कर मथा जतन से मक्खन
या बालू से
काढ़ के खाया तेल !
मुह की बात लील
न रही गुंजाइस पेट बढ़ाने की
तभी अधपची आग को
जगह देख
उल्टी कर देने की
आदत रही जमाने से,
दया प्रेम सदभाव को
बेरहमी से मारा छल ने
कपट कोठारी बन बैठा
परजीवी को
रहा न मतलब
छाती पेर कमाने से,
बहुत समय से केर बेर सा
भिड़े रहे
धुले दूध के
स्वच्छ आचरण दरबारी
झूठ साँच की तुला में
महिनों तुलता रहा रफेल !
भोलानाथ
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