क्या उभरेगी तस्वीर
आईने में
परत
धूल की है पुस्तैनी !
झाड़े पोंछे
जाले कौन उतारे
हाथ
खंधे हैं मलते खैनी !
चुंगी चिलम की
भभक फूंक में
लय जीवन की
तिनके जैसे उड़ी,
परिचय की
जलती हुई मशाल के
नीचे रही
गुमनामी सदा खड़ी,
संपर्कों के सूरज
अस्तूरों को
देते
रहे धार नित पैनी !
सुधियों के
उड़ते तोतों ने
खाया खेत
खूब चोंच चटकारा,
कथा सुनी
गुरु ज्ञान लिया
दिया न धेला
चिथरा चिथरा झोली फारा,
हुआ
हतास न हिम्मत हारा
जुता रहा खेतों
जस हल बैल हरैनी !
सड़क लीक
न पगडंडी का
लिया सहारा
तोड़ रहे हैं समय शिला,
अपनी राह बनाने
निकले राही हैं
नहीं
किसी से कोई गिला,
हारे थके की साथी
अपनी
है झोपड़ पट्टी
कुशा खाट सुस्तैनी !
भोलानाथ
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