Monday, 20 September 2021

बहुत दिनों से जाग रहा हुन

बहुत दिनों से जाग रहा हूँ 

सो लेने दे उत्पात न कर
तू भी कर विश्राम
नींद भरी है
आंखों में रात गुजरने वाली है !

दिन भर नाक बजाती
सोती लंबी चादर तान
करने पड़ते हमें हजारों काम
हारे थके
भाग दौड़ के दो जून की थाली है !

सिरे पकड़ने को जीवन की लय के
कंधे डारे जाल फिरे हम
बंजारों सा टूटा जांगर
छोर मिली न
तुमने खिचड़ी खूब पकाई,
घिरी रही तालीम सीमाओं में
तब तुमने खोला द्वार एक तो
रोक सके न पागल मन को
कविता नाम
बता कर जब तू रूह समाई,

सिरा एक पा दौड़े बल भर
मजबूती से
चले तुम्हारे साथ
रहे निभाते निष्ठा से रस्में
फिर भी दूजा हाथ जेब में खाली है !

रात रात के जागे रूपवान
आकार गढ़ा
सहलाया खूब सम्हारा
उपमानों और प्रतीकों को
मुह धारदार संवाद दिया,
अक्षर अक्षर शब्द शब्द
अपने भावात्मक सूत में
मोती माणिक सा लड़ियों
खूब पिरोया पथ पगड़ी से
राजहितों तक श्रृंगार किया,

ताल तलैया पोखर झरने
सागर नदिया
तारों की बारात दिखाया
धरती भोजन जल पान कराया
हिमहवा हिमालय की झाली है !

परवाह न की जीवनयापन की
हम रहे तुम्हारे साथ सदा
झपक तिरोहित नयन रहीं
बतकही में उलझे
ध्यान दिया न आहट पर,
उन्नीदी करवट की
गरम उसांसों का संकेत
खनक पर खनक चूड़ियों की
सरगम रुनझुन पायल की
झनकार पास मंचवाहट पर,

अमलतास के फूल झरे
पतझर के पात पलाशों पर
ऋतुमति ऋतुओं का
मनभावन संज्ञान लिया न
भीतर मैना बिरह की पाली है !

भोलानाथ



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