पिछली दौड़ के आगे
दौड़ दौड़ कर मर खप केमैदानों में रैयत ने
एक एक के
आगे सौ सौ झंडे गाड़े !
नमो नमो का नारा दे कर
राज तिलक कर दिया
चाय के हरकारे का
दिग दिगंत बज रहे
उसी के ढोल नगाड़े !
उंची उड़ान है उंचे उंचे
अब रही न फुरसत
नीचे की सुधि लेने की
भूल गये अखबार रेवड़ी
मूंमफली रेरी पान के खुंचे,
फुरसत में जिन
बीड़ी वालों के संग
रमी खेलते समय बिताया होगा
या कूद कूद कर
गली मोहल्ले खेले कांच के कंचे,
चुंगी के चर्चों में है
फिर आज अमेरिका
तंगी में रह कर भी पिटें
तालियां झोलीबाड़ा के बाड़े !
सेवा निवृत्त जिन बूढ़ों ने
मजबूती से बांह पकड़ कर
तिलक लगाया मीलों मील चले
जयघोष किया
बोझ हैं सिर के आज वही,
जाना समझा मिला अनेकों बार
सुना फिर भी न संवेदन जागा
न ही संज्ञान लिया
यहां वहां के
रहा दिखाता खाता और बही,
रहने को खोली न कमरा
जहन जवानी देश को दे दी
खुले गगन का
असह गुजारा
गिन गिन तोड़े तन के हाड़े !
निराश हतास नहीं हम
बिल्कुल भी कुछ अच्छा ही
करके लौटेगा देश की खातिर
कभी कभी अपनी पीड़ा
निवारण की गा लेते हैं,
खाना दाल दवा के अभाव में
रोज रोज बढ़ती पेंशन की
आश में शव के ढेर
देख कर सरकारी
उपेक्षा का विष पी लेते हैं,
जिये हों दुर्दिन कैसे भी
उम्मीदों की छांव
नहीं छोड़ी दुख सह कर
स्वागत
अभिनंदन में रहे अगाड़े !
भोलानाथ
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