उछल कूद न
बहुत डार से डारफल झार न नीचे
अकल का
आका मत बन बंदर !
बहुत बघार न
सेखी
सुन मरे महंत का किस्सा
सड़ गई
खिचड़ी मठ के अंदर !
भक्ति भावना का
खाकर
व्याभिचारी
जीवंत आस्था पर
रहे जूठे हाथ अंचा,
तू आग लगा
कचरे में
जलती है तो
जल जाने दे लंका
सच की आन बचा,
चेता नही तो
पन्नी पुट्ठे में
दब जायेगा
संगम का
यह उठा बबंडर !
सूंघ सुराख न
पुण्य पाप का
चोले के भीतर
ठाठ बाठ का
पलता कोढ़ उजागर कर,
सुन पढ़
अगस्त को
ढोंकी सागर
पोंक रही हैं तोंदें
पचा न पानी औंधी गागर,
विद्या बुद्धि विरत
कुबेर के घर में
कोने कोने
नाच रही है
सजी छछुंदर !
बिना बाल की
खाल निकाले
लम्बी दाढ़ी का
काला तिनका
नोक सुई की कैसे काढ़े,
पुचकार
पूंछ न ऐसे
डार दे उंगली घोंघा
उगलेगी
आंत सभी कुछ ठाढ़े,
पेट के
दांतों ठीहों से
लहरा कर
बह निकलेगा
नरकाकुण्ड समुंदर !
भोलानाथ
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