स्नेही जन जो अब तक
मिले हमेंप्रचलित गलियों में
सुनै न एकौ बात हमारी
अपनी अपनी गावें
सीधा आंगन
टेढ़ बतावे रीछ नचावैं खड़े खड़े !
अपनेपन का ढोंग धतूरा
भांग पिलाते
पहचान
मुलाकातों में बदली
बात बतसिया नातेदारी
चंदन कलफ धुली
सावन में निकरे चीकन घड़े घड़े !
चुप रह मत कह
आगे का सोचा
भनक लगे कि बैरी खाये
पुरखों के मुह
यह सुनी
कहावत बंधी रही बसनी से,
फिर भी जिये
जनम भर
धोखे ही धोखे हम
मतिमारी जहन की
सुधियां समझ
मौन हैं कढ़े न लांपा कछनी से,
दर्द चुभन के बीच छोड़ के
ले उड़ी मल्हम
अपनों की हमदर्दी
कांख कराह
गहिर घावों की मक्खी हाकें
अखबारों की
रद्दी से बिस्तर में पड़े पड़े !
परेसान नहीं
हैरान बहुत है
जीवन की नदिया जीती
क्षीणकाय धार की
हवा में
उड़ती देख मछलियां,
जल जीवअबोधों को
लहरों ने
बहकाया होगा
धूप ताप की धार नहा
सायद
पा लें हूरों की गलियां,
जलती आग अंगारे लपटें
उंचे उंचे
कितनी और उठेंगी
कितना घी तेल जवा
आग में डाला जायेगा
देखेगी दुनिया
कब तक चौखट में जड़े जड़े !
इच्छाहीन झूठ मूठ की
बैठक चर्चा
देश विदेश के
भाषण
जैसे बैठे ठाले की
इधर उधर की उठाधरी,
गुल्लक तोड़ की परंपरा यह
कब तक और चलेगी
धर कर
खाता बही सही
चुकता हिसाब कर
मत गिन चिल्हर घरी घरी,
मन आधा मन
शेर छटाक पाव पाव के
जो धरे बटहरा
माप तौल का पढ़े पहाड़ा
जोर जोर से तोता जैसे
रट रहा ककहरा
फोड़ रहा है फुग्गे बड़े बड़े !
भोलानाथ
No comments:
Post a Comment