Tuesday, 14 September 2021

बस कर रहने दे और सुना न

15/09/2021

बस कर रहने दे 

और सुना न मूंड हिला कर

मत गा पगले 

भीतर पलते आत्म मोह की 

अनुशंसा में 

झूम चहक के कोकिल कंठ बहर ! 


गीत गजल की चौखट में 

केवल रंग नहीं 

कविता के स्वर भर 

जब तक

करुणा पीड़ा खुशी गमों के 

अहसास न होंगे अमृत और जहर ! 


शब्दों का ब्रम्हांड तो होगा 

अनुपयोगी व्यर्थ निरर्थक

धूप ताप संताप 

त्याग वैराग्य साधना 

त्योहारों 

की झलक न होगी,

कलम करिश्मा व्यंग विदूषक 

मृतप्राय विजूका बेबोलों से 

गीत की खोल में रह 

संवाद करेंगे 

जिनमे 

कविता की अलख न होगी, 


खड़े मंच पर 

मनमानी गायेंगे स्वयं संगनी के

अंतरंग 

अनुभूति के किस्से 

धरती पड़ी दरार 

दिखाएंगे नक्शे में बड़ी नहर ! 


आत्म वेदना या 

उल्लास हर्ष का 

संगीत झरे न अखरा अखरा

घुंघरू पायल का 

सहगान न झंकृत हो 

धमनी सांस शिराओं में,

आसक्ति या तप बैराग्य का 

मन मुग्धा बिम्ब 

न उभरे मन मष्तिष्क के 

दर्पण में 

आंदोलित हो जाये हृदय 

विपरीत दिशा धाराओं में, 


बजने लगे बंसुरिया 

मीठी मीठी कान जहन में 

जन जन के 

होने लगे संचार प्रेम का 

बदले सोच शहर 

न हों हिंसायें थमे कहर ! 


रचनाओं में यदि तेरे घुली है 

कविता तो गाता चल 

बृजधाम धरा सा 

प्रेम की पावन गंगा का 

अमृत 

प्यासों को हर हाल पिला,

खुरदरी राग लय 

नाकाम छंद बंद के 

केचुआ गठबंधन को 

नये नये उपनाम न दे 

टेर अबाबील गलगलियों को 

कविता के स्वर ताल मिला, 


जागेंगे सोते से श्रोता 

पढ़ पढ़ पाठक 

गीतों में कविताई 

रचनाओं में गोते 

खूब लगायेंगे 

महसूसेंगे वीणा लहर लहर ! 


भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...