धरा नहीं कुछ गांव में ऐसा
बचा नहीं कुछशेष आकर्षण उत्सव
जिसकी सोहरत पर्व के
दुर्लभ किस्से
कथा कहानी गायी जाये !
दूध दोहनिया दिखे न माखन
अईरा गोरु
गाय उपेक्षित मरे भूख से
घंटे घुंघरू गले बैल के
और
दिखै न कंधे जुआं उठाये !
बाग बगीचे पोखर झरने
चुनगुन कलरव
दांय
गडायन जवा जबारे
मढ़ियों पंडे लोक कलायें
उड़ता समय बिम्ब ले भागा,
कटी फटी मिट्टी की
सतियां चढ़ी दिवारें
आंगन तुलसी
गोबर लिपा बैठका
हुक्का की गुड़गुड़ आहट
धरे संदेश न मोगरी कागा,
भोर भिन्सारे घुरुर घुरुर
संगीत न जतवे का
न चूड़ी पायल की झनकार
सूने पनघट
अब चुहल चिरैया
उड़ उड़ धूधुर नही नहाये !
लोटा ले निस्तार बहाने
हीर न निकले
पार करे कस लक्ष्मण रेखा
भीतर कुसमित पंचवटी से
महकती
तितली न उस पार उतारे,
बिरह व्यथा की कथा
सुनाता
बंजारों सा नहीं भटकता
गलियों गलियों रांझा
न ही तान छेड़ता
बासुरिया की नदी किनारे !
शहरी व्यामोहों में माटी छूटी
सपनों के संसार का
जिस तिस से
पता पूछते भटक रहा है
आज
आदमी खुद को मूड उठाये !
सबका साथ विकास सभी का
सुघर सलोना नारा
सुन चल पड़े सभी
छोड़ जमीन विरासत की
परसादी जिसे मिली
वह पंजीरी सा लील गया,
जिसको पूजा मिलीं न परसादी
मुह की थाल हाथ से छूटी
वह पेट की देखे
या फिर पकड़े जमीन
या छोड़े
किया धरा सब नया नया,
पुरखों की थाती
नासमझी में छूटी
लगी बुझाई के व्यापारी
घूम रहे हैं गली गली
ओठों धनुष
कुबोलों के बाण चढाये !
भोलानाथ
No comments:
Post a Comment