Tuesday, 28 September 2021

कुछ खबर मिली न बहुत दिनों से

 कुछ खबर 

मिली न बहुत दिनों से
कैसी चुप्पी छाई शहर में
न कोई उत्सव
बाजा गाजा
दूर दूर तक दिखे नहीं
न सजे ओठ कविताई !

कोर कसर नहीं
भीड़ भाड़ में
लाईव और अलाईव
मंचों के विज्ञापन में
विस्तार है लेकिन
हलचल
हिया हिलोरी कहीं हिराई !

बड़े नाम थे जिनके
हर चौराहे
गली मोहल्ले
चर्चाओं में रहने वाले
किरदारों के
कलम के किस्से
अब हो गये और बड़े,
दर्शन दुर्लभ हुये
सपन में
संगत का सुख था
चर्चाओं में कब थे
हम उनके
बस्तों में अपने गीत लिये
हरदम पीछे रहे खडे,

रंग भेद न किया फ़ाग में
लिथड़े रहे
कीच में सदा सदा
छुआ कभी न उनकी टोपी
न ही
खोद खुरच कर देखा
प्रतिभा की गहराई !

डार न चूके रहे हमेशा
कोशिश में
फुनगी पर अपनी
उंची कूद के करतब
दिखलाने को
फिर भी खीटे
से मुखियों ने अलग किया,
मौन साध
गुपचुप चूस रहे सब
अर्जित टॉफी
फतह किये सोपानों से
अनभिज्ञ रहे हम
किसी संदेसा
कोई पाती ने सूचित नहीं किया,

फूले कांस
अईताती बारिश
चढ़ गई
उल्टी धार मछलियां
उबी में है खुरी कोरैया
खोट खलल
गुलमछरी की हुद्द बुद्द चतुराई !

कुछ खता हुई हमसे
या प्रभुताई पर
राहु के आ जाने से
अहम का चिड्डा
मौज बखानी में
झूम झूम के नाचा
भूसी की सैंढ़ पर,
वैसे भी रहवास रहा
चने के झाड़ पर
साबित करते रहे सदा
अखरा अखरा
ब्रम्हवाक सा
प्रचलित
ढर्रे की पुस्तैनी ऐंढ़ पर,

अदद आचरण की
आदत गदे पड़ी है
रही लालसा
आत्मसात स्वीकार किये
हर हलचल
रहे पूछते
जिस तिस से सबकी भेंट भलाई !

भोलानाथ

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