गली सड़क से
राज पथों तक
वही तमाशे मजमे हैं
कुछ नहीं बदला
समय स्वरूप का
हेर फेर बस दस्तूर पुराना है !
आदर्शों का
वही पिजामा टोपी
संघर्षों में नीद आंख की
मन का बुझा उराव
झूठे जुमले बस दुहराते जाना है !
ममता घायल छमता घायल
बढ़ते
अपराध की जिम्मेदारी
खेत किसानी
व्यापारी सब घायल
रोटी नून में खुश मजदूरी,
न कुछ खोने का भय
न कुछ पाने की अभिलाषा
पाँव पसीना सिर
छाती भुजदण्ड से निथरे
भींगे
चिथरे चिपकें देह से पूरी,
चढ़ी धूप तन महगाई से
आहत नहीं होते
धीर तसल्ली के
साधक बस इतना जानें
गुजर
बसर के साधनअधियाना है !
अर्थ शास्त्र के उन्नत नुस्खे
जीवन में
जाने अनजाने
तृषित विलास का
धीरे धीरे घोल रहे हैं
मीठा मीठा मौन जहर,
सुघर सलोना मौसम
इठलाती ऋतुओं की
ओठों में स्याही
कृतिम साधनों के मुह में
लसक लिपिस्टिक
चमक चली है बहर,
अंधी दौड़ की होड़ में
पीछे छूटी परम्पराओं के
फिर से वाजिब
अर्थ खोज कर
नूतन शैली के
नये वस्त्र पहिराना है!
अलग अलग
मजमों के मदारी
खेल रहे जो खेल
उन अर्ध सत्य संदर्भों के
धुआं धुंध से परिचय का
उपक्रम करना होगा,
समय की पीठ का
कुछ नाजायज कचरा
सम्बल सामर्थ्य मुताबिक
आहिस्ता आहिस्ता
वैज्ञानिक पद्धति से
साफ हमें करना होगा,
अपनी बुद्धि विवेक की
दूषित जलधाराओं के
तिलिस्मी मायाजाल
हटा कर
स्वच्छ सादगी का
निर्मल परचम लहराना है !
भोलनाथ
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