हुए पस्त पत्थर से लड़कर
दुख का पहाड़ यहकैसे टूटेगा
पीछे नहीं सहारा कोई
टूटी छैनी
हाथ हथौड़ा बाहर दस्ते से भागा !
हारे थके चूर चूर हो
शिलाखण्ड पर
पसरे कुहनी मार थपेड़े
धूप के सहते
दे रहा तसल्ली साहस
हाथ बंधा विस्वास का धागा !
संचार ऊर्जा का
देह में हो तो
थकन घटे
फिर लेटे लेटे आंख बंद कर
औजार जुटाने की
कोई तरकीब की सोचें,
धूप नहाये निचोयें क्या
आमदनी की उड़ी चिरैया
झरे रुये पखनो की
जाया हुई बचत
लाचारी के दिन
बाल नाक के नोचें,
बिना हाट बाजार के
टेली शॉपिंग मॉल से
बाबा मोल बिकाती
बातों के युग में
उधार जिंदगी को
मिलता नहीं उधार का मांगा !
सबके अपने
मुह पेट के कारण
जायज और नाजायज
अलग अलग जीन्स के
बेल रहे सब छोटे बड़े
मझोले माप के पापड़,
उतार दिया
नकाब मंडियों ने
कद भले अलग हो
चेहरे एक ही सांचे के ढाले हैं
इसीलिये
गालों में है एक सा झापड़,
जाति धर्म के स्वर भले अलग हों
हाट बाजार की
एक ही भाषा बोली है
अम्मा के भाग से
खोंपा
कोयल बोले चाहे बोले कागा !
भाड़ फोड़ते भेंट चढ़ी
टोपी उड़ रही हवा में
हुड़दंग जोगड़े
चढ़े बांस पर
करें प्रसारण
लाइव जपें जपी सा जाप,
हमें हमारे निश्चय से
भटकाने की कोशिश
रही सदा
गदा भांजती लाचारी से
लड़ राह बनाई
छोड़ा शिला शिला पर छाप,
फूंक फूंक कर
दबी राख की चिंगारी
दहन किया कमियों की होली
हाथ सेकने नही आया
चिड़िया
चुग गई खेत बसेरा देर से जागा !
भोलानाथ
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